Rajasthan राजस्थान राज्य

जयपुर
जयपुर उच्चारण जिसे गुलाबी नगर के नाम से भी जाना जाता है, भारत में राजस्थानराज्य की राजधानी है। आमेर के तौर पर यह जयपुर नाम से प्रसिद्ध प्राचीन रजवाड़े की भी राजधानी रहा है। इस शहर की स्थापना 1728 में आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने की थी। जयपुर अपनी समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा, सरस-संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यह शहर तीन ओर से अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है। जयपुर शहर की पहचान यहाँ के महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी धौलपुरी पत्थरों से होती है जो यहाँ के स्थापत्य की खूबी है। 1876 में तत्कालीन महाराज सवाई रामसिंह ने इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रिंस ऑफ वेल्स युवराज अल्बर्ट के स्वागत में पूरे शहर को गुलाबी रंग से आच्छादित करवा दिया था। तभी से शहर का नाम गुलाबी नगरी पड़ा है। 2011 की जनगणना के अनुसार जयपुर भारत का दसवां सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर है। राजा जयसिंह द्वितीय के नाम पर ही इस शहर का नाम जयपुर पड़ा। जयपुर भारत के टूरिस्ट सर्किट गोल्डन ट्रायंगल का हिस्सा भी है। इस गोल्डन ट्रायंगल में दिल्ली,आगरा और जयपुर आते हैं

चूरू
यह एक ऐतिहासिक किला है। काफी संख्या में पर्यटक यहां घूमने के लिए आते हैं। इस किले का निर्माण बीकानेर के राजा रत्‍नसिंह ने 1820 ई. में करवाया था। यह किला आगरा-बीकानेर मार्ग पर स्थित है। इस जगह के आसपास कई हवेलियां भी है। यहां रेतीले टीले हवा की दिशा के साथ आकृति और स्थान बदलते रहते हैं। इस शहर में कन्हैया लाल बंगला की हवेली और सुराना हवेली आदि जैसी कई बेहद खूबसूरत हवेलियां हैं, जिनमें हजारों छोटे-छोटे झरोखे एवं खिड़कियाँ हैं। ये राजस्थानी स्थापत्य शैली का अद्भुत नमूना हैं जिनमें भित्तिचित्र एवं सुंदर छतरियों के अलंकरण हैं। नगर के निकट ही नाथ साधुओं का अखाड़ा है, जहां देवताओं की मूर्तियां बनी हैं। इसी नगर में एक धर्म-स्तूप भी बना है जो धार्मिक समानता का प्रतीक है। नगर के केन्द्र में एक दुर्ग है जो लगभग 400 वर्ष पुराना है।

गंगानगर
गंगानगर जनपद का प्रमुख प्रशासकीय केंद्र तथा विकासशील नगर भी है। इसका नामकरण बीकानेर के महाराज गंगासिंह के नाम पर हुआ है। यह जिले के सर्वाधिक समुन्नत तथा सिंचित कृषिक्षेत्र में स्थित होने के कारण प्रमुख व्यापारिक मंडी तथा यातायात केंद्र हो गया है। श्रीगंगानगर को राजस्थान का अन्न का कटोरा भी कहा जाता है | यहाँ जनपदीय प्रशासनिक कार्यालयों तथा न्यायालयों के अतिरिक्त कई स्नातक महाविद्यालय तथा अन्य सांस्कृतिक संस्थान हैं। यह नगर पूर्णतया 20वीं शताब्दी की देन है। प्रारंभिक दशाब्दियों में यह अज्ञात ग्राम रहा। लेकिन गंग-नहर सिंचाई परियोजना द्वारा क्षेत्र में कृषि का विकास होने के कारण इसकी जनसंख्या अधिक बढ़ गई है। यहाँ 1945 में चीनी का कारखाना खोला गया। यहाँ एक औद्योगिक संस्थान की भी स्थापना हुई है। श्रीगंगानगर में श्री बुड्ढाजोहड़ गुरुद्वारा व लैला-मजनुं की मजार प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं |

कोटा
प्रारंभ में कोटा बूंदी राज्य का एक हिस्सा था। मुगल शासक जहांगीर ने जब बूंदी के शासकों को पराजित किया तो कोटा 1624 ई. में एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित हुआ। राव माधो सिंह यहां के प्रथम स्वतंत्र शासक के रूप में गद्दी पर बैठे। 1818 ई. में कोटा ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गया।यह संग्रहालय पुराने महल में स्थित है और इसे राजस्थान के सबसे बेहतरीन संग्रहालयों में माना जाता है। कोटा राज्य के प्रथम शासक राव माधो सिंह के नाम पर संग्रहालय का नाम रखा गया है। संग्रहालय में कोटा की खूबसूरत पेटिन्ग, मूर्तियों, तस्वीरें, हथियार और शाही वंश से संबंधित अनेक वस्तुएं देखी जा सकती हैं।यह महल कोटा की एक रानी द्वारा 1740 ई. में बनवाया गया था। खूबसूरत किशोर सागर झील के मध्य बना यह महल राजाओं के आमोद प्रमोद का स्थान था।

हनुमानगढ़
हनुमानगढ़ भारत के राजस्थान प्रान्त का एक शहर है। यह उत्तर राजस्थान में घग्घर नदी के दाऐं तट पर स्थित है। हनुमानगढ़ को सादुलगढ़ भी कहते हैं। यह बीकानेर से 144 मील उत्तर-पूर्व में बसा हुआ है। यहाँ एक प्राचीन क़िला है, जिसका पुराना नाम भटनेर था। भट्टीनगर का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ भट्टी अथवा भट्टियों का नगर है।हनुमानगढ़ जिला देश के गर्म इलाकों में आता है। गर्मियों में धूल भरी आंधियां तथा मई जून में लूचलती है, सर्दियों में चलने वाली ठंडी उत्तरी हवाओं को डंफर कहते हैं। गर्मियों में यहाँ का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा चला जाता है। हालाँकि सर्दियों में रातें अत्यधिक ठंडी हो जाती है और पारा शून्य तक गिर जाता है। ज्यादातर इलाका कुछ वर्षों पहले सूखा रेगिस्तान था, परन्तु आजकल करीब-करीब सारे जिले में नहरों से सिंचाई होने लगी है

सीकर
सीकर जिला भारत के राजस्थान प्रान्त का एक जिला है। यह जिला शेखावाटी के नाम से जाना जाता है, यह प्राकृतिक दृष्टि महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण हैŀ यहां पर तरह- तरह के प्राकृतिक रंग देखने को मिलते हैं सीकर जिले को “वीरभान” ने बसाया ओर “वीरभान का बास” सीकर का पुराना नाम दिया। राजा माधोसिंह जी ने वर्तमान स्वरूप प्रदान किया ओर सीकर नाम दिया। इन्होंने छल करके “कासली” गांव के राजा से गणेश जी की मूर्ति जीती, ये मूर्ति कासली के राजा को एक़ सन्त द्वारा भेंट की गई थी, इस मूर्ति की प्राप्ति के बाद कासली गांव “अविजय” था, कई बार सीकर के राजा ने कासली को जीतने का प्रयास किया लेकिन असफल रहा, बाद में गुप्तचरों के जरिये जब इसके बारे में सूचना हासिल हुई तो आपने एक विश्वसनीय सैनिक को साधु का भेष धराकर कासली भेजा और छल से ये मूर्ति हासिल की तथा आगली सुबह कासली पर आक्रमण कर विजय हासिल की। छल से मूर्ति प्राप्त करने और विजय हासिल करने के बाद सीकर राजा ने महल के सामने गणेश जी का मंदिर भी बनवाया जो की आज भी सुभाष चोक में स्थित है।

सिरोही
सिरोही पश्चिमी भारत में राजस्थान राज्य में एक शहर है। यह [[सिरोही जिला] का प्रशासनिक मुख्यालय है और पूर्व में देवड़ा चौहान राजपूत द्वारा शासित सिरोही राज्य रियासत की राजधानी थी। इसमें पांच तहसील (प्रशासनिक प्रभाग) हैं:आबू रोड, शिवगंज, रेवदर, पिंडवाड़ा और सिरोही स्वयं। इसे देवनगरी भी कहा जाता है। सिरोही के निकटतम रेलवे स्टेशन सिरोही रोड है। सिरोही को वर्ष 2014 में “स्वच्छ भारत अभियान” के लिए राजस्थान के 33 जिलों में पहला स्थान मिला। सिरोही राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य राजमार्गों के माध्यम से भारत के सभी शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। आरएसआरटीसी की जयपुर, उदयपुर, अजमेर, कोटा, बाड़मेर, दिल्ली, अहमदाबाद, सूरत, कल्याण सिरोही सेंट्रल बस की स्टॉप से ​​दैनिक सेवाएं हैं।

सवाई माधोपुर
सवाई माधोपुर का इतिहास रणथंभौर दुर्ग के आस-पास घूमता है। विंध्य और अरावली से घिर रणथंभौर क़िले के बारे में अभी तक सही-सही पता नहीं चल पाया है कि इसका निर्माण कब हुआ था। इस क़िले की ताकत और दुर्गम रास्ता इसे शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करता था, विशेष रूप से दिल्ली और आगरा के शासक यहाँ पहुंचने में असमर्थ लगते थे। क़िले के प्रमुख शासक राव हम्मीर चौहान थे जिन्होंने 1296 के आसपास यहाँ शासन किया। क़िले का सुंदर वास्तुशिल्प, तालाब और झील इसके निर्माण के कला प्रेम और ज्ञान को दर्शाते हैं। क़िले का प्रत्येक हिस्सा भारतीय संस्कृति और दर्शन का प्रतीक है।

जैसलमेर
जैसलमेर राज्य भारत के पश्चिम भाग में स्थित थार के रेगिस्तान के दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में फैला हुआ था। मानचित्र में जैसलमेर राज्य की स्थिति 20001 से 20002 उत्तरी अक्षांश व 69029 से 72020 पूर्व देशांतर है। परंतु इतिहास के घटनाक्रम के अनुसार उसकी सीमाएँ सदैव घटती बढ़ती रहती थी। जिसके अनुसार राज्य का क्षेत्रफल भी कभी कम या ज्यादा होता रहता था। जैसलमेर का क्षेत्र थार के रेगिस्तान में स्थित है। यहाँ दूर-दूर तक स्थाई व अस्थाई रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले हैं, जो कि हवा, आंधियों के साथ-साथ अपना स्थान भी बदलते रहते हैं। इन्हीं रेतीले टीलों के मध्य कहीं-कहीं पर पथरीले पठार व पहाड़ियाँ भी स्थित हैं। इस संपूर्ण इलाके का ढाल सिंध नदी व कच्छ के रण अर्थात् पश्चिम-दक्षिण की ओर है।

झालावाड़
राजस्थान के झालावाड़ ने पर्यटन के लिहाज से अपनी एक अलग पहचान बनाई है। राजस्थान की कला और संस्कृति को संजोए यह शहर अपने खूबसूरत सरोवरों, किला और मंदिरों के लिए जाना जाता है। झालावाड़ की नदियां और सरोवर इस क्षेत्र की दृश्यावली को भव्यता प्रदान करते हैं। यहां अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल भी हैं, जो पर्यटकों को अपनी ओर खींचने में कामयाब होते हैं।झालावाड़ मालवा के पठार के एक छोर पर बसा जनपद है। इस जनपद के अंदर झालावाड़ और झालरापाटन नामक दो पर्यटन स्थल है। इन दोनों शहरों की स्थापना 18वीं शताब्दी के अन्त में झाला राजपूतों द्वारा की गई थी। इसलिए इन्हें जुड़वा शहर भी कहा जाता है। इन दोनों शहरों के बीच 7 किमी की दूरी है। यह दोनों शहर झाला वंश के राजाओं की समृद्ध रियासत का हिस्सा था।

जोधपुर
जोधपुर शहर के लोग बहुत मिलनसार होते है, ये सदैव दुसरों की मदद के लिये ततपर रहते है, उलझी हुई घुमावदार गलियाँ पटरियों पर लगी दुकानों से घिरी हैं। कलात्मक रूप से बनी हुई रंगबिरंगी पोशाकें पहने हुए लोगों को देखकर प्रतीत होता हैं कि जोधपुर की जीवनशैली असाधारण रूप से सम्मोहित करने वाली है। औरतें घेरदार लहंगा और आगे व पीछे के हिस्सों को ढकने वाली तीन चौथाई लंबाई की बांह वाली नितम्ब स्थल तक की जैकेट पहनती हैं। पुरूषों द्वारा पहनी हुई रंगीन पगड़ियाँ शहर में ओर भी रंग बिखेर देती हैं। आमतौर से पहने जाने वाली ढ़ीली ढ़ाली और कसी, घुड़सवारी की पैंट जोधपुरी ने यहीं से अपना नाम पाया। जोधपुर के कपदो मैं जोधपुरी कोट पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

झुन्झुनू
झुन्झुनू राजस्थान राज्य में एक शहर और जिला है। इतिहासकारों के अनुसार झुंझुनू को कब और किसने बसाया, इसका स्पष्ट विवरण नही मिलता है| उनके अनुसार पांचवी-छठी शताब्दी में गुर्जर काल में झुंझुनू बसाया गया था| आठवीं शताब्दी में चौहान शासकों के काल का अध्ययन करते हैं तो उसमे झुंझुनू के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है| डॉ. दशरथ शर्मा ने तेहरवी शताब्दी के कस्बों की जो सूची दी है उसमे झुंझुनू का भी नाम है| इसी प्रकार अनंत और वागड राज्यों के उल्लेख में भी झुंझुनू का अस्तित्व कायम था| सुलतान फिरोज़ तुगलक (ई. सन 1338-1351) के बाद कायमखानी वंशज आये| कहते हैं, कायम खान के बेटे मुहम्मद खान ने झुंझुनू में अपना राज्य कायम किया, इसके बाद लगातार यह क्षेत्र कयामखानियों के अधिपत्य में रहा| एक उल्लेख यह भी मिलता है की सन 1451-1488 के बीच झुन्झा नमक जाट ने झुंझुनू को बसाया

टोंक
यह बनास नदी के ठीक दक्षिण में स्थित है। भूतपूर्व टोंक रियासत की राजधानी रह चुके इस शहर की स्थापना 1643 में अमीर खाँ पिंडारी ने की थी और यह छोटी पर्वत श्रृंखला की ढलानों पर अवस्थित है। इसके ठीक दक्षिण में क़िला और नए बसे क्षेत्र हैं। आसपास का क्षेत्र मुख्यत: खुला और समतल है, जिसमें बिखरी हुई चट्टानी पहाड़ियाँ हैं।यहाँ मुर्ग़ीपालन और मत्स्य पालन होता है तथा अभ्रक और बेरिलियम का खनन होता है। भूतपूर्व टोंक रियासत में राजस्थान एवं मध्य भारत के छह अलग-अलग क्षेत्र आते थे, जिन्हें पठान सरदार अमीर ख़ाँ ने 1798 से 1817 के बीच हासिल किया था। 1948 में यह राजस्थान राज्य का अंग बना।टोंक में आज कल बहुत गन्दगी रहने लगी है जबकि नवाब की ज़माने में आज़ादी से पहले बहुत साफ़ सुथरा शहर था। रोज़ सुबह एवं शाम सड़के मशकों से धोई जाती थीं। हर स्थान कूड़े और गंदगी के ढेर पड़े हैं, और यहाँ की सड़कों पर फिर रहे आवारा सुवर और भी गंदगी फैलाते रहते हैं।

दौसा
दौसा भारत के राजस्थान का एक प्रमुख शहर एवं लोकसभा क्षेत्र है। दौसा राजस्थान का एक ऐतिहासिक नगर है। यह जयपुर से 54 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दौसा राष्ट्रीय राजमार्ग 11 पर स्थित है। दौसा का नाम पास ही की देवगिरी पहाड़ी के नाम पर पड़ा। दौसा कच्छवाह राजपूतों की पहली राजधानी थी। इसके बाद ही उन्होंने आमेर और बाद में जयपुर को अपना मुख्यालय बनाया। 1562 में जब अकबर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की जियारत को गए तब वे दौसा में रुके थे। दौसा में ऐतिहासिक महत्व के अनेक स्थान है जो यहाँ के प्राचीन साम्राज्य की याद दिलाते हैंदौसा को देवनगरी के नाम से भी जाना जाता है। झाझीरामपुर प्राकृतिक कुंड और रुद्र, बालाजी तथा अन्य देवी-देवताओं के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यह स्थान दौसा नगर से 45 किलोमीटर की दूरी पर है। पहाड़ियों से घिरी इस जगह की प्राकृतिक और आध्यात्मिक सुंदरता मन को सुकून पहुँचाती है।

डूंगरपुर
सफेद पत्थरों से बने इस सातमंजिला महल का निर्माण 13वीं शताब्दी में हुआ था। इसकी विशालता को देखते हुए यह महल से अधिक किला प्रतीत होता है। इसका प्रचलित नाम पुराना महल है। इस महल का निर्माण तब हुआ था जब मेवाड़ वंश के लोगों ने अलग होकर यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया था। महल के बाहरी क्षेत्र में बने आने जाने के संकर रास्ते दुश्मनों से बचाव के लिए बनाए गए थे। महल के अंदर की सजावट में कांच, शीशों और लघुचित्रों का प्रयोग किया गया था। महल की दीवारों और छतों पर डूंगरपुर के इतिहास और 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच राजा रहे व्यक्तियों के चित्र उकेरे गए हैं। इस महल में केवल वे मेहमान की आ सकते हैं जो उदय विलास महल में ठहरे हों।

धौलपुर
देश को आजाद कराने के लिये देश के कितने ही लोगों ने अपनी जान की क़ुरबानी दी। ऐसे ही अपने धौलपुर के तसीमों गांव के शहीदों का नाम आता है शहीद छत्तर सिंह परमार और शहीद पंचम सिंह कुशवाह। जिन्होंने देश के लिए अपनी जान की क़ुरबानी दी। धौलपुर के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है दिन था 11 अप्रैल 1947 जब प्रजामंडल के कार्यकर्ता तसीमों गांव में सभा स्थल पर एकत्रित हुये थे। तब झंडा फहराने पर रोक थी, लेकिन नीम के पेड़ पर तिरंगा लहर रहा था और सभा चल रही थी। उसी समय सभास्थल पर पुलिस के साथ सैंपऊ के तत्कालीन मजिस्ट्रेट शमशेर सिंह, पुलिस उपाधीक्षक गुरुदत्त सिंह तथा थानेदार अलीआजम पहुंचे और उन्होंने तिरंगे झंडे को उतारने के लिये आगे आए तो प्रजामंडल की सभा में मौजूद ठाकुर छत्तर सिंह सिपाहियों के सामने खड़े हो गए

नागौर
नागौर भारत के राज्य राजस्थान का एक प्रमुख शहर एवं लोकसभा क्षेत्र है। यह नागौर जिलामुख्यालय है। नागौर राजस्थान का एक छोटा सा शहर है।

पाली
पाली जिला भारत के राजस्थान प्रान्त का एक जिला है जिसकी पूर्वी सीमाएं अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़ी हैं। इसी सीमाएं उत्तर में नागौर और पश्चिम में जालौर से मिलती हैं। पाली शहर पालीवाल ब्राह्मणों का निवास स्थान था जब मुगलों ने कत्लेआम मचा दिया तो उन्हें यह शहर छोड़ कर जाना पड़ा। वीर योद्धा महाराणा प्रताप का जन्म भी यहीं पर अपने ननिहाल में हुआ था। यह नगर तीन बार उजड़ा और बसा। यहां के प्रसिद्ध जैन मंदिर भक्तों के साथ-साथ इतिहासवेत्ताओं को भी आकर्षित करते हैं। ये राजपूत वर्चस्व वाला जिला है यहाँ सभी सामान्य सीटो के 5 प्रधान राजपूत है /

प्रतापगढ़
प्रतापगढ़ जिला समुद्र तल से औसतन 1610 फीट या 580 मीटर की ऊँचाई पर बसा है और कहा यह जाता है कि ऊँचाई की दृष्टि से राजस्थान में माउन्ट आबू के बाद सर्वाधिक ऊँचाई वाला यही जिला है। न यहां-पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जैसा दहकता हुआ रेगिस्तान है, न चूरु जैसे शहरों सी कड़ाके की ठंड! स्थानीय जलवायु मनभावन समशीतोष्ण है। पुराने प्रतापगढ़ राज्य के उत्तर में ग्वालियर, दक्षिण में रतलाम, पश्चिम में मेवाड़ (उदयपुर) और बांसवाड़ा) पूर्व में जावरा/ मन्दसौर और नीमच के राज्य और जिले थे। भारतीय उपमहाद्वीप की सर्वाधिक प्राचीन पर्वतमाला अरावली और मालवा के पठार की संधि पर अवस्थित राजस्थान के इस जिले के भूगोल में अरावली और मालवा दोनों की ही भौगोलिक-विशेषताएँ एक साथ पहचानी जा सकती हैं। पुराने दस्तावेजों के अनुसार जाखम, शिव, एरा, रेतम और करमोई मुख्य नदियाँ थीं। 30 ग्रामीण तालाबों के अलावा यहाँ तेजसागर नामक प्रमुख तालाब था। जाखम, माही और सिवाना यहाँ की तीन मुख्य नदियाँ हैं, छोटी-छोटी बरसाती नदियों के अलावा अन्य नदियों में सोम, एरा और करमोई नामक नदियाँ भी हैं, जो प्रायः ग्रीष्मकाल में सूख जाती हैं, पर पड़ौसी जिले बांसवाड़ा के विख्यात माही बांध में प्रतापगढ़ जिले की कई नदियों और प्राकृतिक जलधाराओं का पानी शामिल होता है।

बांरा
बांरा : बारां को प्राचीन वराह नगरी के नाम से जाना जाता है। बांरा कालीसिंध, पार्वती व परवन नदियों के बीच स्थित है। बारां का नामकरण : प्राचीन काल में 12 तालाब थे जिन्हें पाटकर नगर बसाया गया, जो बांरा कहलाया। नामकरण की अन्य किंवदिति : प्राचीन समय में इसके अन्तर्गत बारह गाँव आते थे, इसलिए यह क्षेत्र बांरा कहलाया। बांरा-राजस्थान के दक्षिण-पूर्व में हाड़ौती क्षेत्र में आता है। सीमा रेखा → बारां के पूर्व में मुरैना, शिवपुरी व गुना (मध्यप्रदेश), उत्तर पश्चिम में कोटा तथा दक्षिण झालावाड़ स्थित है।

बांसवाड़ा
ऐतिहासिक तौर पर वागड़ राज्य की स्थापना के कई तथ्य पाए जाते हैं। एक मान्यता के अनुसार बंसिया भील ने बांसवाड़ा (Banswara) की नीव रखी थी जबकि एक दूसरा मत यह है कि गुहिलोतों ने वागड़ राज्य की स्थापना की थी। इन तथ्यों के बावजूद ज्यादातर यही माना जाता है कि इस राज्य के वास्तिवक संस्थापक सामन्तसिंह थे। उन्होंने 1179 ईस्वी के लगभग वागड़ प्रदेश को अधिकृत किया। सामन्तसिंह के पुत्र सिंहडदेव के पौत्र वीरसिंह देव (विक्रम सम्वत 1343—1349) तक वागड़ के गुहिलवं​शीय राजाओं की राजधानी बड़ौदा—डूंगरपुर थी। जब वीरसिंह के पोते डूंगरसिंह ने डूंगरपुर शहर बसाकर इसे अपनी राजधानी बनाया तब से वागड़ के राज्य का नाम उसकी नई राजधानी के नाम से डूंगरपुर प्रसिद्ध हुआ। कस्बे के पूर्व में प्रतिवेशी पहाड़ियों द्वारा बने एक गर्त में बाई तालाब नाम से ज्ञात एक कृत्रिम तालाब है जो महारावल जगमाल की रानी द्वारा निर्मित बताया जाता है। लगभग 1 किलोमीटर दूर रियासत के शासकों की छतरियां हैं।

बीकानेर
बीकानेर एक अलमस्त शहर है, अलमस्त इसलिए कि यहाँ के लोग बेफिक्र के साथ अपना जीवन यापन करते है। बीकानेर नगर की स्थापना के विषय मे दो कहानियाँ लोक में प्रचलित है। एक तो यह कि, नापा साँखला जो कि बीकाजी के मामा थे उन्होंने राव जोधा से कहा कि आपने भले ही राव सांतल जी को जोधपुर का उत्तराधिकारी बनाया किंतु बीकाजी को कुछ सैनिक सहायता सहित सारुँडे का पट्टा दे दीजिये। वह वीर तथा भाग्य का धनी है। वह अपने बूते खुद अपना राज्य स्थापित कर लेगा। जोधाजी ने नापा की सलाह मान ली। और पचास सैनिकों सहित पट्टा नापा को दे दिया। बीकाजी ने यह फैसला राजी खुशी मान लिया। उस समय कांधल जी, रूपा जी, मांडल जी, नथु जी और नन्दा जी ये पाँच सरदार जो जोधा के सगे भाई थे साथ ही नापा साँखला, बेला पडिहार, लाला लखन सिंह बैद, चौथमल कोठारी, नाहर सिंह बच्छावत, विक्रम सिंह राजपुरोहित, सालू जी राठी आदि कई लोगों ने राव बीका जी का साथ दिया। इन सरदारों के साथ राव बीका जी ने बीकानेर की स्थापना की। सालू जी राठी जोधपुर के ओंसिया गाँव के निवासी थे। वे अपने साथ अपने आराधय देव मरूनायक या मूलनायक की मूर्ति साथ लायें आज भी उनके वंशज साले की होली पे होलिका दहन करते है।

राजसमन्द
राजसमन्द भारतीय राज्य राजस्थान का एक जिला है। जिले का मुख्यालय राजसमन्द है। यह अरावली पर्वतमाला के बीच में स्थित है। शहर और जिले का नाम मेवाड़ के राणा राज सिंह द्वारा 17 वीं सदी में निर्मित एक कृत्रिम झील, राजसमन्द झील के नाम से लिया गया है। जिला गया है 10 अप्रैल 1991 को उदयपुर जिले के राजनगर और कांकरोली को मिलाकर राजसमन्द जिले का गठन किया गया था।

भीलवाड़ा
यह तालाब शहर के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित है किसी ज़माने में यह लोगो के लिए प्रमुख पेयजल स्रोत हुआ करता था इस तालाब के मध्य में एक विशाल टापू स्थित है यह तालाब लोगो के लिए महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है इसके उत्तरी छोर पर हजरत मंसूर अली रहमतुल्लाह अलेह व हजरत जलाल शाह रहमतुल्लाह अलेह की दरगाह स्थित हे इन दरगाहो के एक तरफ तेजाजी का मंदिर और दूसरी तरफ बालाजी का मंदिर स्थित हे इस पर्यटन स्थल को विकसित करने के लिए इसके दक्षिणी किनारे पर एक मनोरम पार्क का निर्माण कराया गया है

भरतपुर
भरतपुर राष्ट्रीय उद्यान केवलादेव घना के नाम से भी जाना जाता है। केवलादेव नाम भगवान शिव को समर्पित मंदिर से लिया गया है जो इस उद्यान के बीच में स्थित है। घना नाम घने वनों की ओर संकेत करता है जो एक समय इस उद्यान को घेरे हुए था। यहाँ करीब ३७५ प्रजातियों के पक्षी पाये जाते हैं जिनमें यहाँ रहने वाले और प्रवासी पक्षी शामिल हैं। यहाँ भारत के अन्य भागों से तो पक्षी आते ही हैं साथ ही यूरोप, साइबेरिया, चीन, तिब्बत आदि जगहों से भी प्रवासी पक्षी आते हैं। पक्षियों के अलावा साम्भर, चीतल, नीलगाय आदि पशु भी यहाँ पाये जाते हैं।

उदयपुर
उदयपुर बनास नदी पर, नागदा के दक्षिण पश्चिम में उपजाऊ परिपत्र गिर्वा घाटी में महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने 1559 में स्थापित किया था। यह मेवाड़ राज्य की नई राजधानी के रूप में स्थापित किया गया था। इस क्षेत्र ने पहले से ही 12 वीं सदी के माध्यम से 10 वीं में मेवाड़ की राजधानी के रूप में कार्य किया था, जो एक संपन्न व्यापारिक शहर आयड़ था। गिर्वा क्षेत्र पहले से ही कमजोर पठार चित्तौड़गढ़ था कि जब भी यह करने के लिए ले जाया गया है जो चित्तौड़ शासकों के लिए अच्छी तरह से जाना जाता है, इस प्रकार था दुश्मन के हमलों के साथ धमकी दी। महाराणा उदय सिंह द्वितीय, तोपखाने युद्ध की 16 वीं सदी के उद्भव के बाद में, एक अधिक सुरक्षित स्थान पर अपनी राजधानी को स्थानांतरित करने के कुंभलगढ़ में अपने निर्वासन के दौरान फैसला किया।जहाँ अपनी नई राजधानी शहर है, शुरू करने के लिए पिछोला झील के रिज पूर्व चुना है, बाढ़ की आशंका थी। साधु ने राजा को आशीर्वाद दिया और यह अच्छी तरह से संरक्षित किया जाएगा उसे आश्वस्त मौके पर एक महल का निर्माण करने के लिए उसे निर्देशित। उदय सिंह द्वितीय फलस्वरूप साइट पर एक निवास की स्थापना की। नवंबर 1567 में मुगल बादशाह अकबर ने चित्तौड़ की पूजा किले को घेर लिया।

चित्तौड़गढ़
चित्तौड़गढ़ राजस्थान का एक शहर है। यह शूरवीरों का शहर है जो पहाड़ी पर बने दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है। चित्तौड़गढ़ की प्राचीनता का पता लगाना कठिन कार्य है, किन्तु माना जाता है कि महाभारत काल में महाबली भीम ने अमरत्व के रहस्यों को समझने के लिए इस स्थान का दौरा किया और एक पंडित को अपना गुरु बनाया, किन्तु समस्त प्रक्रिया को पूरी करने से पहले अधीर होकर वे अपना लक्ष्य नहीं पा सके और प्रचण्ड गुस्से में आकर उसने अपना पाँव जोर से जमीन पर मारा, जिससे वहाँ पानी का स्रोत फूट पड़ा, पानी के इस कुण्ड को भीम-ताल कहा जाता है; बाद में यह स्थान मौर्य अथवा मूरी राजपूतों के अधीन आ गया, इसमें भिन्न-भिन्न राय हैं कि यह मेवाड़ शासकों के अधीन कब आया, किन्तु राजधानी को उदयपुर ले जाने से पहले 1568 तक चित्तौड़गढ़ मेवाड़ की राजधानी रहा। यहाँ पर रोड वंशी राजपूतों ने बहुत समय राज किया। यह माना जाता है गुलिया वंशी बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी के मध्य में अंतिम सोलंकी राजकुमारी से विवाह करने पर चित्तौढ़ को दहेज के एक भाग के रूप में प्राप्त किया था, बाद में उसके वंशजों ने मेवाड़ पर शासन किया जो 16वीं शताब्दी तक गुजरात से अजमेर तक फैल चुका था।

करौली
यह करौली जिला का मुख्यालय है। इसकी स्‍थापना 955 ई. के आसपास राजा विजय पाल ने की थी जिनके बारे में कहा जाता है कि वे भगवान कृष्‍णके वंशज थे। 1818 में करौली राजपूताना एजेंसी का हिस्‍सा बना। 1947 में भारत की आजादी के बाद यहां के शासक महाराज गणेश पाल देव ने भारत का हिस्‍सा बनने का निश्‍चय किया। 7 अप्रैल 1949 में करौली भारत में शामिल हुआ और राजस्‍थान राज्‍य का हिस्‍सा बना।करौली का सिटी पेलेस राजस्‍थान के प्रमुख पर्यटक स्‍थलों में से एक है। मदन मोहन जी का मंदिर देश-विदेश में बसे श्रृद्धालुओं के बीच बहुत लोकप्रिय है। अपने ऐतिहासिक किलों और मंदिरों के लिए मशहूर करौली दर्शनीय स्‍थल है।यह महल करौली का मुख्‍य आकर्षण है। इसका निर्माण अर्जुन पाल ने 14वीं शताब्‍दी में कराया था। लेकिन इसका वर्तमान स्‍वरूप का श्रेय राजा गोपाल सिंह को जाता है जिन्‍होंने 18वीं शताब्‍दी में इसका पुन: निर्माण करवाया था। लाल बलुआ पत्‍थर से बने इस महल में सफेद पत्‍थरों का भी खूबसूरती से इस्‍तेमाल किया गया है। महल की छत से शहर का पूरा दृश्‍य देखा जा सकता है।

जालौर
जहाज मंदिर एक जैन मंदिर है जो बिशनगढ़ से 5 किलोमीटर दूर है। श्री शांतिनाथ प्रभु की प्रतिमा और परमात्मा का मार्ग पंचधातु से बनाया गया है। मुख्य प्रतिमा के दायीं ओर आदिनाथ और बायीं ओर भगवान वसुपूज्य विराजमान हैं। मंदिर के अन्य कोनों पर भी मूर्तियां रखी गई हैं। अराधना भवन और भोजशाला के साथ ही एक विशाल धर्मशाला भी जुड़ी हुई है। जालौर एक शान्‍त एवं सुसज्जित क्षैृ हे यहाँ पर बाहर के जिलों के कर्मचारी ज्‍यादा कार्यरत हैा शिक्षा का स्‍तर बहुत कमजोर हैा श्री स्वर्णगिरी तीर्थ जालौर शहर के पास स्वर्णगिरी पहाड़ी पर स्थित है। पद्मासन मुद्रा में बैठे भगवान महावीर यहां के मुख्य अराध्य देव हैं। मंदिर का निर्माण राजा कमरपाल ने करवाया था और इसकी देखरख श्री स्वर्णगिरी जैन श्‍वेतांबर तीर्थ पेढ़ी नामक ट्रस्ट करता है। भगवान महावीर की श्‍वेत प्रतिमा की स्थापना 1221 विक्रम संवत में की गई थी।

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